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🌸 मनुष्यत्व का चश्मा
मानव देह और मानवता की परख की कथा
एक समय की बात है। एक ब्राह्मण देश-देशांतर की यात्रा करते हुए एक समृद्ध नगर में पहुँचा। नगर की भव्यता देखते ही बनती थी। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे महल, विशाल अट्टालिकाएँ और धन-वैभव से परिपूर्ण घर दिखाई दे रहे थे। ब्राह्मण ने सोचा कि ऐसे समृद्ध नगर में उसे भिक्षा अवश्य मिल जाएगी। इसी आशा से वह घर-घर भिक्षा माँगने निकल पड़ा।
किन्तु आशा के विपरीत, नगर के किसी भी द्वार से उसे दो मुट्ठी अन्न तक प्राप्त नहीं हुआ। किसी ने उसकी ओर देखा तक नहीं, किसी ने द्वार बंद कर लिया, तो किसी ने अपमान से मुँह फेर लिया। धीरे-धीरे दोपहर बीत गई। भूख से उसका शरीर शिथिल हो चला और मन पीड़ा से भर उठा। वह अपने दुर्भाग्य को कोसता हुआ नगर से बाहर की ओर बढ़ चला। उसके मन में यह पीड़ा थी कि इतने बड़े नगर में रहते हुए भी उसे रोटी बनाने लायक आटा तक नसीब नहीं हुआ।
उसी समय मार्ग में एक सिद्ध संत की दृष्टि उस ब्राह्मण पर पड़ी। संत दूरदृष्टा थे और मनुष्य के भीतर छिपे संस्कारों को पहचानने की क्षमता रखते थे। उन्होंने ब्राह्मण की पीड़ा को समझ लिया और उसे यह बोध कराया कि वह जिनसे भिक्षा माँग रहा था, वे भले ही मनुष्य के शरीर में हों, किंतु भीतर से अभी मनुष्य नहीं बने थे। वे अपने पूर्वजन्मों के पशु-संस्कारों में ही जी रहे थे। किसी में हिंसा थी, किसी में स्वार्थ, किसी में भय और किसी में अहंकार। जब तक मनुष्य के भीतर करुणा, संवेदना और दूसरे के दुःख को समझने की क्षमता नहीं जागती, तब तक वह केवल शरीर से मनुष्य होता है, भाव से नहीं।
संत ने ब्राह्मण को एक दिव्य चश्मा प्रदान किया और उसे निर्देश दिया कि वह उसी नगर में जाकर पुनः भिक्षा माँगे और इस चश्मे के माध्यम से लोगों को देखे। ब्राह्मण ने ऐसा ही किया। जैसे ही उसने चश्मा पहनकर लोगों को देखा, वह विस्मय से भर उठा। जिन घरों के द्वार पहले बंद हो गए थे, वहाँ अब उसे मनुष्य नहीं बल्कि कोई कुत्ते के समान लोभी, कोई सियार के समान चालाक, कोई हिरण के समान भयभीत और कोई बाघ के समान क्रूर दिखाई देने लगा। नगर मनुष्यों का नहीं, पशुओं का समूह प्रतीत होने लगा।
इसी क्रम में ब्राह्मण आगे बढ़ा तो उसने एक साधारण मोची को देखा, जो जूते सिलने में लीन था। जब उसने उस व्यक्ति को ध्यान से देखा, तो उसे वहाँ पशुता नहीं, बल्कि करुणा, श्रम, सादगी और प्रेम से भरा मनुष्यत्व दिखाई दिया। ब्राह्मण समझ गया कि यही वह स्थान है जहाँ मानवता जीवित है। यहीं उसने भिक्षा माँगी।
मोची का हृदय द्रवित हो उठा। उसने अपने संचित थोड़े-से धन से ब्राह्मण के लिए भोजन की व्यवस्था की और स्वयं फिर परिश्रम में लग गया। उसके भीतर दान का भाव इतना प्रबल था कि उसने बिना किसी लोभ के ब्राह्मण को सर्वोपरि मान लिया।
उसी दिन संयोगवश उस राज्य का राजा उत्तम जूतियों की खोज में था। अनेक जूतियाँ देखने के बाद भी उसे कोई संतोष नहीं हुआ। अंततः मंत्री की दृष्टि उस मोची पर पड़ी, जिसकी जूतियों में केवल कारीगरी ही नहीं, बल्कि श्रम और भावना की सच्चाई भी थी। जब राजा ने वे जूतियाँ पहनीं, तो वे उसे पूर्णतः अनुकूल लगीं। राजा ने प्रसन्न होकर अत्यधिक मूल्य देने का आदेश दिया।
किन्तु मोची ने उस धन को अपने लिए स्वीकार नहीं किया। उसके मन में पहले ही यह निश्चय हो चुका था कि उस जूती से प्राप्त धन भूखे ब्राह्मण का होगा। उसने स्वयं को केवल माध्यम माना। इसी कारण वह ब्राह्मण को राजा के पास ले आया।
जब राजा को इस पूरे प्रसंग का ज्ञान हुआ और ब्राह्मण ने सिद्ध संत तथा चश्मे की कथा सुनाई, तो राजा में भी जिज्ञासा जागी। उसने वह चश्मा पहनकर अपने दरबार को देखा। उसे अपने चारों ओर मनुष्य नहीं, बल्कि विविध पशु-स्वभावों से भरे दरबारी दिखाई दिए। यह देखकर राजा विचलित हो उठा। जब उसने स्वयं को देखा, तो उसे सिंह का रूप दिखाई दिया—जंगल का राजा, जो शक्ति के बल पर शासन करता है।
यह अनुभूति राजा के लिए आत्मचिंतन का क्षण बन गई। उसे यह बोध हुआ कि केवल सत्ता और वैभव से मनुष्य श्रेष्ठ नहीं बनता। मनुष्य वही है, जिसमें करुणा, न्याय और संवेदना हो।
ब्राह्मण ने अंततः यह भी स्पष्ट किया कि अब किसी चश्मे की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य के व्यवहार, उसकी दृष्टि और उसके कर्म ही यह बता देते हैं कि उसके भीतर मनुष्यत्व जाग्रत है या पशुता शेष है। यदि कोई परिश्रम किसी और का हो और अधिकार कोई और जताए, तो वह पशु-संस्कार का संकेत है। किंतु यदि कोई बिना स्वार्थ सेवा करे, तो वहीं मनुष्यत्व खिलता है।
यह भी बताया गया कि पशुता से मनुष्यत्व की ओर यात्रा संभव है। कुसंस्कारों को त्यागकर, समय के मूल्य को समझकर, सत्संग और विवेक के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर छिपे पशु को बाहर निकाल सकता है। जब विवेक जाग्रत हो जाता है, तब किसी सिद्ध संत के चश्मे की आवश्यकता नहीं रहती।
🌼 नीति / Moral
👉 मनुष्य का मूल्य उसके शरीर से नहीं, उसके व्यवहार से तय होता है।
👉 जहाँ करुणा, दया और संवेदना है, वहीं सच्चा मनुष्यत्व है।
👉 बिना मानवता के मनुष्य भी पशु के समान हो जाता है।
👉 विवेक और सत्संग वह चश्मा हैं, जो हमें स्वयं को पहचानने की दृष्टि देते हैं।
मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है।
बिन मानवता के मानव भी पशुतुल्य रह जाता है।
🌹 श्री राधे राधे 🌹