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कथा : भक्तमाल के रचयिता महाभागवत श्रीनाभादासजी

 

भक्ति की परम्परा में जिन महापुरुषों का जीवन स्वयं एक दिव्य कथा बन गया, उनमें श्रीनाभादासजी का नाम विशेष श्रद्धा से लिया जाता है। उनका जीवन गुरु-कृपा, विनय और भक्तिरस का अद्भुत संगम है। कहा जाता है कि श्रीनाभादासजी जन्म से ही नेत्रहीन थे। परन्तु यह नेत्रहीनता साधारण नहीं थी। वे तब तक संसार को नहीं देखना चाहते थे, जब तक उन्हें गुरुदेव की कृपा प्राप्त न हो जाए। गुरु-कृपा से जब उनके नेत्र खुले, तो उन्होंने सबसे पहले गुरुगोविन्द के दर्शन किए। यही उनके सम्पूर्ण जीवन की दिशा बन गई।

श्रीनाभादासजी का दूसरा नाम श्रीनारायणदास था। वे श्रीरामानन्द सम्प्रदाय के महान् आचार्य माने जाते हैं। उनके गुरु स्वामी श्रीअग्रदासजी थे, जिनकी आज्ञा से उन्होंने आगे चलकर अमर ग्रन्थ ‘भक्तमाल’ की रचना की। उनकी गुरु-परम्परा श्रीरामानन्दाचार्य से होते हुए श्रीअनन्तानन्द, कृष्णदास पयहारी, कील्हदासजी और श्रीअग्रदासजी तक चली आती है।

भक्तमाल में नाभादासजी ने अपने जीवन का वर्णन नहीं किया, परन्तु श्रीप्रियादासजी ने भक्तिरसबोधिनी टीका में उनकी प्रारम्भिक अवस्था का उल्लेख किया है। उनके अनुसार नाभादासजी का जन्म हनुमान-वंश में हुआ। अकाल के समय उनके माता-पिता उन्हें जंगल में छोड़ गए। मात्र पाँच वर्ष का वह नेत्रहीन बालक वन में भटक रहा था। दैवयोग से उसी वन में श्रीकील्हदासजी और श्रीअग्रदासजी पहुँचे।

बालक की करुण स्थिति देखकर श्रीकील्हदासजी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने अपने कमण्डलु से जल लेकर बालक की आँखों पर छींटा दिया—और वह दिव्य क्षण आ गया जब बालक को दृष्टि प्राप्त हुई। नेत्र खुलते ही उसकी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले और वह दोनों महात्माओं के चरणों में गिर पड़ा। वे दोनों उसे अपने साथ गलता (जयपुर) ले आए। वहीं श्रीअग्रदासजी ने उसे मंत्रोपदेश दिया और संत-सेवा में लगा दिया।

संतों की सेवा, उनके प्रसाद का ग्रहण और निरन्तर संग—इसी से नाभाजी का हृदय भक्ति-रस में डूबता चला गया।

गुरु की आज्ञा से आगे चलकर उन्होंने भक्तमाल की रचना की—एक ऐसा ग्रन्थ जिसमें सभी सम्प्रदायों के भक्तों की समान रूप से महिमा गाई गई है।

 

व्रज लीला और नाभादासजी की दिव्य कथा

नाभादासजी के सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध व्रज लीला भी प्रचलित है, जो उन्हें ब्रह्माजी से जोड़ती है। यह लीला श्रीकृष्ण की ब्रह्मा-विमोह लीला से सम्बन्धित मानी जाती है। कहा जाता है कि एक बार ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण की लीला की परीक्षा लेने के लिए व्रज के ग्वालबालों तथा गौ-बछड़ों का हरण कर लिया। परन्तु श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से उन्हीं के समान अन्य ग्वालबालों और गौओं की सृष्टि कर दी। व्रजवासियों को तनिक भी भेद ज्ञात नहीं हुआ। जब ब्रह्माजी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ, तो वे लज्जित होकर श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और अपने अपराध के लिए क्षमा याचना की। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें दण्ड नहीं, बल्कि विनय का पाठ दिया। कहा जाता है कि उन्होंने ब्रह्माजी से कहा—

“कलियुग में तुम कुछ समय के लिए नेत्रहीन होकर जन्म लोगे, जिससे अहंकार का क्षय हो। परन्तु संत-कृपा से तुम्हें पुनः दिव्य दृष्टि प्राप्त होगी और तुम भक्तों की महिमा का गान करोगे।”

इसी किंवदन्ती के अनुसार ब्रह्माजी ने ही नाभादासजी के रूप में जन्म लिया। पाँच वर्ष की नेत्रहीन अवस्था उनके पूर्वकृत अहंकार के क्षय का प्रतीक मानी जाती है और संत-कृपा से दृष्टि प्राप्त होना भगवद् अनुग्रह का चिह्न।

 

भक्तमाल : सम्प्रदाय से ऊपर भक्ति

नाभादासजी का यह दृढ़ विश्वास था कि इस भवसागर से पार होने का एकमात्र उपाय भक्तगुणगान है। उनके लिए भक्त छोटा या बड़ा नहीं होता। जैसे शालग्राम या तुलसीदल छोटा-बड़ा होने पर भी समान रूप से पूज्य होता है, वैसे ही हर भक्त अनन्त गुणों से युक्त और महान् होता है। इसी भाव से उन्होंने भक्तमाल की रचना की—जहाँ राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, गणेश सभी के भक्त समान श्रद्धा के पात्र हैं। उन्होंने स्वयं को कभी ग्रन्थकार नहीं माना, बल्कि पूर्ववर्ती महापुरुषों के उच्छिष्ट को बीनने वाला एक विनीत सेवक माना। इस प्रकार श्रीनाभादासजी का सम्पूर्ण जीवन यह सन्देश देता है कि अहंकार का क्षय, गुरु की कृपा और भक्तों की महिमा—यही सच्ची साधना है।