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युग बदलते रहते हैं। समय की धारा आगे बढ़ती जाती है, पर मनुष्य के प्रश्न वही रहते हैं—
मैं कौन हूँ?
मेरा कर्तव्य क्या है?
मेरे शब्द, मेरे कर्म और मेरे निर्णय किस दिशा में जा रहे हैं?
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य केवल अतीत की कथाएँ नहीं हैं। वे मानव चेतना के दर्पण हैं। उनमें देवता नहीं, पहले मनुष्य आते हैं—संघर्ष करते हुए, भ्रमित होते हुए, गिरते हुए और फिर उठते हुए।
यहाँ संकलित प्रसंग किसी एक कथा या एक युग तक सीमित नहीं हैं। यहाँ द्रौपदी का पश्चाताप है, जहाँ शब्द एक पूरे युद्ध की जड़ बन जाते हैं। यहाँ कलियुग की व्यथा है, जहाँ धर्म मौन हो जाता है और मनुष्य दिशाहीन। और यहाँ रामायण का माहात्म्य है, जो अंधकार में भी अमृत की धारा बनकर बहता है।
इन कथाओं का उद्देश्य न तो किसी को दोषी ठहराना है, न ही उपदेश देना। इनका उद्देश्य केवल इतना है—
पाठक को स्वयं से संवाद करने के लिए विवश करना।
जब कृष्ण कहते हैं कि शब्द भी कर्म हैं,
जब राम मर्यादा के लिए स्वयं त्याग स्वीकार करते हैं,
और जब कलियुग में भी रामकथा मोक्ष का द्वार बनती है—
तब यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म कोई ग्रंथ नहीं, बल्कि जीने की शैली है।
यह संकलन उन पाठकों के लिए है—
• जो धर्म को समझना चाहते हैं, पर आँख मूँदकर नहीं
• जो भक्ति चाहते हैं, पर विवेक के साथ
• और जो कथाओं में केवल मनोरंजन नहीं, जीवन का सत्य खोजते हैं
यदि इन प्रसंगों को पढ़ते हुए
आप एक क्षण के लिए रुक जाएँ,
अपने शब्दों को तौलें,
अपने कर्मों पर दृष्टि डालें—
तो इस संकलन का उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा।
क्योंकि युगों का सत्य यही है—
राम मर्यादा हैं, कृष्ण विवेक—
और मनुष्य, उनके बीच खड़ा एक साधक।